Tulnatmak Rajniti Ki Rooprekha (तुलनात्मक राजनीति)Hindi Edition by OP Gauba
Rs. 399.00
Sale price
Rs. 399.00
Regular price
Rs. 450.00
राजनीति विज्ञान में तुलनात्मक अध्ययन क्रान्तिकारी और नया नहीं है। राजनीति में प्रारम्भ से ही तुलनात्मक अध्ययन का प्रयोग किया जाता रहा है।
राजनीति और शासन के तुलनात्मक अध्ययन की परम्परा हम अरस्तू और उसके पहले भी पाते हैं। बाद में मेकियावेली, मान्टेस्क्यू, ब्राइस, लास्की, फाइनर आदि विचारकों ने इस पद्धति को अपनाया। दूसरे महायुद्ध के पहले तक इसका विकास छोटे स्तर पर ही होता रहा।आज सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से राजनीतिशास्त्र का यह एक महत्वपूर्ण अंग बन गया है और इसके अन्तर्गत अनेकों सिद्धांतों व अवधारणाओं को जन्म दिया गया है।
तुलनात्मक राजनीति के विकास का दूसरा चिन्ह मैकयावली और पुनर्जागरण के युग में मिलता है। राज्य की उत्पत्ति, राजनीतिक व्यवस्था शासन कला के विषय में निगमनात्मक पद्धति का परित्याग कर दिया गया तथा मैकयावली जैसे विचारकों ने वैज्ञानिक तटस्थता की नीति को अपनाते हुए उन दिनों की परिस्थितियों का गंभीरता से अध्ययन किया।
दूसरे महायुद्ध के बाद तुलनात्मक राजनीति के क्षेत्र में जिन नयी प्रवृत्तियों का समावेश हुआ वे निम्नलिखित हैं :
- 1. तुलनात्मक राजनीति का क्षेत्र बहुत अधिक बढ गया है। उसमें न केवल पश्चिमी देशों का बल्कि अपाश्चात्य व्यवस्थाओं का गहन अध्ययन किया जाने लगा है।
- 2. राज्य व शासन की संस्थाओं से अधिक सामाजिक समूहों के राजनीतिक कार्यों तथा सामाजिक संस्थाओं के राजनीतिक मूल्यों को ढालने में अदा की गयी भूमिका के अध्ययन पर अधिक से अधिक बल दिया जा रहा है।
- 3. तुलनात्मक विश्लेषण के लिए दूसरे विषयों से नयी अवधारणात्मक योजनाएँ ली जा रही हैं और नये प्रतिमानों का निर्माण किया जा रहा है। संरचनात्मक–प्रकारात्मक विश्लेषण, आधुनिकीकरण तथा राजनीतिक विकास के ढांचे और राजनीतिक संस्कृति का दृष्टिकोण विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
- 4. राजनीति के क्षेत्र को अधिक से अधिक वैज्ञानिक बनाने का प्रयास जाने लगा।